Thursday, February 12, 2009

हबीबगंज से भिलाई तक

यह भोपाल का हबीबगंज स्टेशन था।  उपयुक्त प्लेटफार्म पर पहुंचने के कुछ ही देर बाद छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस आ गई और हम उस में लद लिए।  यह ट्रेन रोज अमृतसर से शाम साढ़े चार बजे चलती है और तीसरे दिन दोपहर 11.50 बजे बिलासपुर जंक्शन पहुंचती है।  इस नाम की एक डाउन और एक अप ट्रेन हमेशा ट्रेक पर रहती है।  गाड़ी चली तो आधे घंटे से कुछ अधिक ही लेट थी।  एकाध घंटे हम बैठे रहे। पर जैसे जैसे रात गहराती गई मिडल बर्थ खुलने लगी और दस बजते बजते मैं भी मिडल बर्थ पर पहुंच लिया। चाय की आवाजों से नींद खुली तो ट्रेन नागपुर स्टेशन पर खड़ी थी। कोई चार से साढ़े चार का समय था।  मैं ने वैभव से पूछा चाय पियोगे तो उस ने मना किया। लेकिन मैं उतर कर नागपुर प्लेटफार्म देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका।  प्लेटफॉर्म पर आया तो कोई सर्दी नहीं थी।  प्लेटफॉर्म नगर अपनी प्राचीनता की कहानी स्वयं कह रहा था।  ट्रेन बहुत देर वहाँ रुकी रही।  मैं वापस अपनी बर्थ में आ कर कंबल में दुबक लिया।

अगली बार नीन्द दो स्त्रैण ध्वनियों ने भंग की कूपा लगभग खाली था,  सुबह की रोशनी खिड़कियों से प्रवेश कर रही थी।  सामने वाली मिडल बर्थ को गिराया जा चुका था ट्रेन किसी प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। शायद वे दोनों वहीं से बैठी थीं और उन्हें छोड़ने वाले प्लेटफॉर्म पर खड़े उन्हें हिदायतें दे रहे थे।  उन में एक अधेड़ होने का आतुर विवाहिता और दूसरी किशोरावस्था की अंतिम दहलीज पर खड़ी कोई छात्रा थी। मैं ने स्टेशन का नाम पूछा तो गोंदिया बताया गया।  मुझे बीड़ियों का स्मरण हो आया, ब्रांड शायद तीस छाप रहा होगा।  कोई कह रहा था,  ट्रेन कोई एक घंटा लेट हो गई है, या हो जाएगी।  तभी मोबाइल ने पाबला जी की धुन गुन गुनाई।  पूछ रहे थे ट्रेन कहाँ पहुंची।  मैं ने बताया, गोंदिया में खड़ी है।  नागपुर में आधे घंटे से कुछ अधिक लेट थी। यहाँ लोग एक घंटे के करीब बता रहे हैं।  बाकी का अनुमान आप खुद लगाएँ।  उन्हों ने बताया कि वे दुर्ग प्लेटफॉर्म पर हमें खड़े मिलेंगे।  अभी ढाई घंटों का मार्ग शेष था। मुझे नींद की खुमारी थी।  मैं फिर से कंबलशरणम् गच्छामि हो गया।

इस बार आँखें खुली तो तुरंत मोबाइल में समय देखा गया। अभी आठ बीस हो रहे थे। डब्बे में विद्यार्थियों, विशेष रुप से छात्राओं की भारी संख्या थी।  जैसे वह शयनयान न हो कर जनरल डब्बा हो।  गाड़ी की देरी के स्वभाव को देखते हुए दुर्ग पहुँचने में अभी पौन घंटा शेष था।  कुछ ही देर में किसी गाड़ी नगरीय सीमा में प्रवेश करती दिखाई दी।  मैं ने ऐतिहातन पूछ लिया कौन नगर आया?  जवाब दुर्ग था।  मैं एक दम चैतन्य हो उठ बैठा। कंबल आदि समेट कर बैग के हवाले किए और उतरने को तैयार।

प्लेटफॉर्म पर उतरे तो इधर उधर निगाहें दौड़ाई कि कही कोई पगड़ीधारी सिख किसी का इंतजार करता दिखा तो जरूर पाबला जी होंगे।  कुछ सिख दिखे तो, लेकिन उन में से किसी के पाबला होने की गुंजाइश एक फीसदी भी नहीं थी।  उतरी हुई सवारियाँ सब चल दीं, फिर ट्रेन भी। आखिर मोबाइल का सहारा लिया।  पाबला जी पूछ रहे थे ट्रेन कहाँ पहुंची? मैं ने बताया हमें दुर्ग स्टेशन पर उतार कर आगे चल दी।  वे बोले- हम तो अभी घर से निकले ही नहीं।  देरी के हिसाब से तो अभी पहुँचने में पौन घंटा होना चाहिए।  मैं ने कहा कम्बख्त ने गोंदिया के बाद सारी देरी कवर कर ली।  आप चलिए हम प्लेटफॉर्म  छोड़ कर स्टेशन के बाहर निकलते हैं।  वे बोले मैं बीस मिनट में पहुँचता हूँ।

हम दोनों स्टेशन के बाहर निकल कर वहाँ आ गए जहाँ कारों की पार्किंग थी।  कुछ दूर ही स्टेशन का क्षेत्र समाप्त हो रहा था और बाहर की दुकानें दिखाई दे रही थीं।  वहाँ जरूर कोई चाय-कॉफी की दुकान होगी।  सुबह की कॉफी नहीं मिली थी।  पर मुझे यह गवारा न था कि पाबला जी को हमें तलाशने में परेशानी हो।  हम वहीं उन का इंतजार करते रहे।  मैं हर आने वाली वैन में पगड़ी धारी सिख को देखने लगा।  आखिर वह वैन आ ही गई।  हमने अपने बैग उठाए और उसकी और बढ़े।  हमारी बढ़त देख पाबला जी ने भी हमें पहचान लिया।  पाबला जी के साथ उन का पुत्र मोनू (घरेलू नाम) था। दोनों ने हमारे हाथों से बैग लगभग छीने और वैन के हवाले किए।  वैभव को चालक सीट पर बैठे मोनू के साथ बिठाया और पाबला जी मेरे साथ पीछे बैठे।  हम चल दिए भिलाई स्टील प्लांट की टाउनशिप में स्थित पाबला जी के घऱ की ओर।
चित्र -
1.  हबीबगंज (भोपाल)  रेलवे स्टेशन 
2. दुर्ग रेलवे स्टेशन है  
3. पाबला जी।
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