Thursday, November 13, 2008

शादी के पहले टूटी सगाई

भगवान् विष्णु सदा की भांति अपनी ससुराल क्षीर सागर में अवकाश बिता कर लौटे। इस दिन को इतना शुभ मान लिया गया है कि चार माह से इन्तजार कर रहे जोड़े बिना ज्योतिषी की राय के ही इस दिन परिणय संस्कार के लिए चुन लेते हैं। इस कारण शादियाँ बहुत थीं। नगरों में कोई वैवाहिक स्थल ऐसा नहीं था जहाँ बैंड नहीं बज रहा हो। मुझे भी शादी में जाना पड़ा। शादी थी मेरी बींदणी शोभा के चचेरे भाई की पुत्री की। पुरानी प्रथा जो लगभग पूरे विश्व में सर्वमान्य रही है कि शादी कबीले के भीतर हो लेकिन गोत्र में नहीं, उस का पालन हम आज भी 90 से 95 प्रतिशत तक कर रहे हैं। कन्या के विवाह योग्य होते ही गोत्र के बाहर और कबीले में छानबीन शुरू हो जाती है और ज्यादातर मामले वहीं सुलझ लेते हैं।

इस कन्या का मामला भी इसी तरह से सुलझा लिया गया था। कन्या के माता-पिता दोनों अध्यापक हैं और कन्या भी स्नाकतोत्तर उपाधि हासिल करने के उपरांत बी.एड. कर चुकी थी। कबीले (बिरादरी) में ही लड़का भी मिल गया। दोनों के माता पिता ने बात चलाई लड़की देखी-दिखाई गई और तदुपरांत सगाई भी हो गई तकरीबन एक-डेढ़ लाख रुपया खर्च हो गया। शादी की तारीख पक्की हो गई। निमंत्रण कार्ड छपे। टेलीफून मोबाइल की मेहरबानी कि होने वाले दुल्हा-दुलहिन रोज बात करने लगे।

एक दिन शाम को अचानक पिता के मोबाइल फून की घंटी बजी। पता लगा होने वाले दूल्हा होने वाली दुलहिन से बात करना चाहता है।पिता ने फून बेटी को दे दिया, बेटी फून ले कर छत पर चली गई। करीब पन्द्रह मिनट बाद वापस लौटी तो उस की आँखें लाल थीं और गले का दुपट्टा आँसुओं से भीगा हुआ। माँ ने पूछना शुरू किया तो, वह कुछ न बोले। माँ उसे एक तरफ ले गई। तरह तरह की बातें की। आखिर बेटी ने रोते रोते बताया कि मम्मी ये शादी तोड़ दो वरना हो सकता है अगले साल मैं जिन्दा न रहूँ। बात क्या है? पूछने पर कहने लगी -उन का पेट बहुत बड़ा है। वह कभी नहीं भरेगा। माँ-बाप ने तुरंत निर्णय किया और सम्बन्ध तोड़ दिया। शादी के निमंत्रण जो छप चुके थे नष्ट कर दिए गए। लड़के वालों को संदेशा भेजा कि जो सामान सगाई में उन्हें दिया था भलमनसाहत से वापस लौटा दें। सामान कुछ वापस आया कुछ नहीं आया। पर फिर से लड़के की तलाश शुरू हो गई।

आखिर कबीले के बाहर मगर ब्राह्मण समुदाय में ही एक संभ्रान्त परिवार में लड़का मिला। परिवार पूर्व परिचित था। सारी खरी-खोटी देख ने के उपरांत शादी तय हो गई। साले साहब सपत्नीक आ कर निमन्त्रण दे गए थे, तो हमें जाना ही था। बींन्दणी की दो बहनें भी शनिवार को दोपहर तक आ गईं। अदालत में दो दिनों का अवकाश था ही। करीब तीन बजे दोपहर अपनी कार से चल दिए झालावाड़ के लिए। हमें वहाँ के होटल द्वारिका पहुंचना था। जहाँ शादी होनी थी।

कोटा से 20 किलोमीटर दूर नदी पड़ती है, आलनिया। इस पर बांध बना है पूरे साल बांध से रिसता हुआ पानी धीरे धीरे बहता रहता है। इस नदी के पुल से नदी किनारे दो किलोमीटर दूरी पर प्रस्तर युग की गुफाएं हैं जिन में प्रस्तरयुग की चित्रकारी देखने को मिलती है। पुल पार करते ही सड़क किनारे ही नाहरसिंही माता का मंदिर बना है। प्राचीन मातृ देवियों के नाम कुछ भी क्यों न हों आज वे सभी दुर्गा का रूप मानी जाती हैं उसी तरह उन की पूजा होती है। मंदिर के सामने ही जीतू के पिता का ढाबा है। जीतू जो मेरा क्लर्क है, उसे हम घर पर सुरक्षा के लिए छोड़ आए थे। उस के ढाबे पर गाड़ी रोक कर उन्हें बताया कि वह अब सोमवार शाम ही लौटेगा। मेरे साथ जा रही तीनों देवियाँ सीधे माता जी के दर्शन  करने चली गईं। पीछे पीछे मैं भी गया। वापस लौटे तो चाय तैयार थी। कुल मिला कर आधे घंटे का विश्राम पहले 20 वें किलो मीटर पर ही हो गया। शेष बचे 60 किलोमीटर वे हम ने अगले एक घंटे में तय कर लिए और पाँच बजे हम होटल द्वारिका में थे। (जारी)

19 comments:

विवेक सिंह said...

सगाई तो शादी के पहले ही टूट सकती है :)

कुन्नू सिंह said...

ye wala blog maine apne blog me add kar deeya

राज भाटिय़ा said...

चलिये समय से काम हो गया, वरना शादी के बाद सगाई केसे टुटती ??? फ़िर तो बहुत काम होता, :) :)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

वही होवै जो राम रचि राखा
यहाँ तक का सफर रोचक रहा .
माता नारसिँही देवी की जय !
- लावण्या

Udan Tashtari said...

महाराज, हम तो यही मान कर चलते हैं कि जोड़ियाँ उपर से बनकर आती हैं. जैसी हरि इच्छा!!

प्रदीप मानोरिया said...

अनवरत भाषा प्रवाह से युक्त सुंदर संस्मरण
बहुत लंबे अरसे तक ब्लॉग जगत से गायब रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ अब पुन: अपनी कलम के साथ हाज़िर हूँ |

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आगे क्या हुआ जानने की उत्सुकता है.

ताऊ रामपुरिया said...

द्वारका होटल झालावाड की आपने अच्छी याद दिलाई ! यह होटल हाईवे पर ही इंदौर से कोटा जाते समय बांये हाथ को पङता है ! इंदौर से जयपुर हर साल गरमी की छुट्टियों में कार से जाते समय दोपहर का विश्राम ३/४ घंटे यहीं करके शाम को ४ बजे जयपुर के लिए रवाना हुआ करते थे ! वर्षो यह सिलसिला चला ! आज भी कभी कार से जाना होता है गरमी में तो वहीं दोपहर गुजारना अच्छा लगता है ! आपका बड़ा मनोरंजक संस्मरण है ! आगे का देखते हैं ! शुभकामनाएं !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

@ ताऊ, कोटा में बीच में इस भतीजे का घर भी पड़ता है। अब की इधर से निकलो तो कोटा रुकना ही होगा। बेटे को इन्दौर से ही पीछे लगा दूँगा।

E-Guru Maya said...

हरी ॐ हरी ॐ ये भारत है या रोम.

विष्णु बैरागी said...

रोचक यात्रा वृतान्‍त है । अगली किश्‍त की प्रतीक्षा है ।

BrijmohanShrivastava said...

आदरणीय आपकी रचना में न तो मुझे भाषा का प्रबाह दिखा न संस्मरण के सुन्दरता न कार न दोपहर न गरमी न विश्राम न मन्दिर मुझे केवल दिखा भीगी लाल आँखे ,आंसुओं से भीगा दुपट्टा एक साल बाद कुछ अनहोनी होजाने के बिटिया के आशंका और लड़के वालों का कभी न भरने वाला पेट जिसका आकार सुरसा के मुंह से भी ज्यादा बिस्तृत होता चला जारहा है -इसकी समाप्ति का उपचार क्या ?समाज सुधर रहा है सुशिक्षित हो रहा है क्रांती आ रही है बच्चे और बच्ची में कोई भेद नहीं रहा और दहेज़ के राशिः बढती जारही है ,दहेज़ हत्याएं बढ़ रही है /दुल्हन के प्रताड़ना में शोषण में सास और ननद का हाथ उनका हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है और कहा ये जारहा है कि पुरूष महिला पर अत्याचार कर रहा है /पेट ससुर का तो भर भी जाए मगर सास का नहीं भरता =और ये पढ़े लिखे नौजवानों को क्या हो गया है ख़ुद को साले आधुनिक कहते है शिक्षित कहते है नये भारत का निर्माण करेंगे और दहेज़ के मामले में माँ बाप का समर्थन करेंगे पटवारी शादी में कार मांगेगा =मां को अपने बच्चों से बचपन से ही कहना शुरू कर देना चाहिए के बेटा तेरे पापा इतने दुष्ट हैं कि इन्होंने हमसे इतने रूपये गिन्वालिये थे तब फेरों पर बैठे थे पुत्रों को ये भी बताना चाहिए कि बेटा तुम्हारे नाना जी ने कितने कष्ट झेल कर पैसों का बंदोबस्त किया था बेचारे रो रो कर बार बार तेरे दादाजी के पैरों में ढोक दे रहे थे

anitakumar said...

आशा है बिटि्या की शादी बिना किसी परेशानी के संपन्न हो गयी होगी और वो खुश होगी

अभिषेक ओझा said...

ऐसी सगाई तो टूट जाना ही बेहतर हुआ. जो होता है अच्छे के लिए ही होता है. आपके लिए एक लिंक:

http://www.thehindu.com/2008/11/14/stories/2008111456431100.htm

Radhika Budhkar said...

आगे क्या हुआ?ये क्रमश:हमेशा सोचने को मजबूर करता हैं ,सोचते रहो क्या हुआ ,क्या हुआ:-)

नितिन said...

सगाई का टूट जाना वाकई कष्टदायक रहा होगा। खैर, अंत भला तो सब भला।

कोटा-झालावाड इतनी बार गुजरे हैं पर कभी मंदिर/अलनिया बाँध नही रुक पाये।

ताऊ रामपुरिया said...

@ आ.द्विवेदी जी , अब आप हैं तो जब भी जाना हुआ , मिडवे झालावाड की बजाये कोटा ही रहेगा ! मान ना मान आपके मेहमान ! :) आपकी बात से ऐसा लगा की बेटा इंदौर में है सो उनको कहिये ताऊ से भी मिले आकर ! यकीन कीजिये ताऊ उसको नही बिगाडेगा ! :) वो तो ब्लॉग में मजाक मजाक में प्रोफाईल ही ऐसा बन गया ! :)

मैं हाजिर हूँ यहाँ ! आज बुखार अभी कम हुआ है तो ऐसे ही चला आया तब आपका मेसेज दिखा है ! मेरे कान्टेक्ट नंबर्स, पता ठिकाना सब मैं इ-मेल में आपको अलग से दे रहा हूँ ! स्नेह के लिए धन्यवाद !

makrand said...

bahut acchi katha

Gyan Dutt Pandey said...

रोचक और प्रवाह युक्त लेखन।

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