Wednesday, October 29, 2008

जय जय गोरधन! गीत-हरीश भादानी

आज गोवर्धन पूजा है। इस मौके पर स्मरण हो आता है हरीश भादानी जी का गीत "जय जय गोरधन !"
हरीश भादानी राजस्थान के मरुस्थल की रेत के कवि हैं।राजस्थानी और हिन्दी में उन का समान दखल है।   11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में जन्मे । 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादन किया। कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका 'कलम' (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। अनौपचारिक शिक्षा, पर 20-25 पुस्तिकायें प्रकाशित। राजस्थान साहित्य अकादमी से "मीरा" प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी, महाराष्ट्र, पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से "राहुल"  और  के.के.बिड़ला फाउंडेशन से "बिहारी" सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है।

"जय जय गोरधन"  सत्ता के अहंकार के विरुद्ध जनता का गीत है..



 
।। जय जय गोरधन ।।
* हरीश भादानी *


काल का हुआ इशारा
लोग हो गए गोरधन !

 
हद कोई जब
माने नहीं अहम,
आँख तरेरे,
बरसे बिना फहम, 
 तब बाँसुरी बजे
बंध जाए हथेली
ले पहाड़ का छाता 
जय जय गोरधन 
काल का हुआ इशारा!

हठ का ईशर 
जब चाहे पूजा,
एक देवता
और नहीं दूजा,
तब सौ हाथ उठे
सड़कों पर रख दे
मंदिर का सिंहासन
जय जय गोरधन 
काल का हुआ इशारा!

सेवक राजा 
रोग रंगे  चोले,
भाव ताव कर
राज धरम तोले,
तब सौ हाथ उठे,
उठ थरपे गणपत
 गणपत बोले गोरधन
जय जय गोरधन !

काल का हुआ इशारा
 लोग हो गए गोरधन !
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