Monday, May 19, 2008

अटक जाती है सुई, चूड़ी-बाजे की तरह

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शायद नए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि डीवीडी के पहले सीडी और उस से भी पहले कैसेट, और उस से भी पहले म्युजिक रिकॉर्ड करने के लिए एक साधन हुआ करता था ग्रामोफोन। इस में एक थाली के आकार की प्लेट पर ध्वनि वलयों के रुप में अंकित होती थी। इसी कारण ग्रामोफोन को "चूड़ी-बाजा" भी कहते थे।इस प्लेट को ग्रामोफोन रिकॉर्ड कहा जाता था, इस के मध्य में एक सूराख होता था। ग्रामोफोन की डिस्क जिस के मध्य में एक कील सी होती थी। इस डिस्क पर ग्रामोफोन रिकार्ड को उस के मध्य के सूराख को कील में फंसा कर चढ़ा दिया जाता था। फिर यांत्रिक चाबी के जरिए उस डिस्क को घुमाया जाता था, जिस से रिकॉर्ड भी घूमते हुए नाचने लगता था। इस के घूमना शुरु करने के बाद ग्रामोफोन पर लगे एक हाथनुमा छड़ को जिस के एक सिरे पर एक सुई लगी होती थी सुई के सहारे रिकॉर्ड के बाहरी सिरे पर रख दिया जाता था। नाचते हुए रिकार्ड पर सुई सरकती हुई मध्य में कील की तरफ सरकते हुए रिकॉर्ड पर दर्ज ध्वन्यांकन को पढ़ती थी जिसे बाद में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से स्पीकर तक पहुंचा कर मधुर संगीत का आनन्द लिया जाता था।

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कभी कभी सुई सरकने के स्थान पर एक ही वलय पर अटक जाती थी और उस एक वलय पर अंकित ध्वनि ही दोहराई जाती रहती थी। जैसे - वहाँ अगर "मैं जाऊं" अंकित होता तो ग्रामोफोन "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" ही दोहराता रहता था जब तक कि उसे मैनुअली ठीक नहीं किया जाता था।

अब आप कहेंगे। मैं इस पुराण को क्यों बाँच रहा हूँ तो इस की वजह यह है कि इस सीडी डीवीडी के जमाने में न्यूज चैनलों की सुई रोज किसी न किसी वलय पर अटक जाती है। बाकी का रिकॉर्ड बजता ही नहीं है। सिर्फ एक वलय ही बजता रहता है।

मार्के की बात यह कि यह सुई मैनुअली भी तब तक नहीं हटती है। जब तक कि रिकार्ड टूट न जाए। रिकार्ड का श्रवण तक अधूरा रह जाता है।

एक टूटते ही चैनल वाले फिर दूसरा रिक़ार्ड चढा देते हैं, वह चलता रहता है टूटने तक। ये चैनल वाले अपनी सुई क्यों नहीं बदल देते जो हर बार अटकती रहती है, बार-बार अटकती है। कोई रिकार्ड पूरा बजने ही नहीं देती।

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