Saturday, March 8, 2008

महिलाओं पर महेन्द्र “नेह” की कविता और गीत


महेन्द्र नेह से आप परिचित हैं। उन के गीत हम सब नीग्रो हैं और "धूप की पोथी" के माध्यम से करीब दस दिनों से वे घुटने के जोड़ की टोपी (knee joint cap) के फ्रेक्चर के कारण पूरे पैर पर बंधे प्लास्टर से घर पर कैद की सजा भुगत रहे हैं। आज शाम उन से मिलने गया तो अनायास ही पूछ बैठा महिलाओं पर कविता है कोई? फिर फोल्डरों में कविताऐं तलाशी गईं। सात गीत-कविताऐं उन के यहाँ से बरामद कर लाया। एक उन के पसन्द की कविता और एक मेरी पसंद का गीत आप के लिए प्रस्तुत हैं-

महेन्द्र नेह की पसंद की कविता.........

आओ, आओ नदी - महेन्द्र नेह

अनवरत चलते चलते

ठहर झाती है जैसे कोई नदी

इस मक़ाम पर आकर ठहर गई है

इस दुनियाँ की सिरजनहार

इसे रचाने-बसाने वाली

यह औरत।

इतिहास के इस नए मोड़ पर

तमन्ना है उसकी कि लग जाऐं

तेज रफ्तार पहिए उस के पाँवों में

ले जाएं उसे धरती के ओर-छोर।

चाहत है उसकी उग आएं उसके हाथों में

पंख, और वह ले सके थाह

आसमान के काले धूसर डरावने छिद्रों की।

इच्छा है उसकी, जन्मे उसकी चेतना में

एक सूरज, पिघला दे जो

उसकी पोर-पोर में जमी बर्फ।

सपना है उसका कि

समन्दर में आत्मसात होने से पहले

वह बादल बन उमड़े-घुमड़े बरसे

और बिजली बन रचाए महा-रास

लिखे उमंगों का एक नया इतिहास

ब्रह्माण्ड के फलक पर।

इधर धरती है, जो सुन कर उस के कदमों की आहट

बिछाए बैठी है, नए ताजे फूलों की महकती चादर

आसमान है जो उस की अगवानी में बैठा है,

पलक पांवड़े बिछाए

और समन्दर है जो

उद्वेलित है, पूरे आवेग में गरजता-तरजता

आओ-आओ नदी

तुम्हीं से बना, तुम्हारा ही विस्तार हूँ मैं

तुम्हारा ही परिवर्तित सौन्दर्य

तुम्हारे ही हृदय का हाहाकार...........

*************

मेरी पसंद का गीत................

नाचना बन्द करो - महेन्द्र नेह

तुम ने ही हम को बहलाया

तुम ने ही हम को फुसलाया,

तुम ने ही हम को गली-गली

चकलों-कोठों पर नचवाया।

अब आज अचानक कहते हो

मत थिरको अपने पावों पर,

अपनी किस्मत की पोथी को

अब स्वयं बाँचना बन्द करो।

मत हिलो नाचना बन्द करो।।

तुम ने ही हम को दी हाला

तुम ने ही हमें दिया प्याला,

तुम ने औरत का हक छीना

हम को अप्सरा बना ड़ाला।

अब आज अचानक कहते हो

मत गाओ गीत जिन्दगी के,

मुस्कान अधर पर, हाथों में

अब हिना रचाना बन्द करो।

चुप रहो नाचना बन्द करो।।

तुम ने ही हम को वरण किया

तुम ने ही सीता हरण किया,

तुम ने ही अपमानित कर के

यह भटकन का निष्क्रमण किया।

अब आज अचानक कहते हो

मत निकलो घर से सड़कों पर,

अपनी साँसों की धड़कन को

बेचना-बाँटना बन्द करो।

मत जियो, नाचना बन्द करो।।

*********

अब आप बताएं, किस की पसन्द कैसी है?

10 comments:

anitakumar said...

दिनेश जी दोनों कविताएं एक से एक बड़ कर। धन्यवाद

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

सुन्दर प्रस्तुति। ईश्वर से प्रार्थना है कि महेन्द्र जी जल्दी से ठीक हो जाये।

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर! महेन्द्रजी के शीघ्र स्वस्थ होने की मंगलकामनायें।

Udan Tashtari said...

महेन्द्र “नेह” जी दोनों ही कवितायें अद्भुत हैं..पढ़वाने के लिये आभार,

ALOK PURANIK said...

स्वस्थ होने की शुभकामनाएं जी।

Gyandutt Pandey said...

नेह जी की कवितायें अच्छी लगीं। दूसरी कविता में तो लगा कि समय ही हमें राग रंग सिखाता है और वही हमें वैरागी बनने को कहता है।
दुबे जी, माननी अपनी ही चाहिये - समय भले ही बरगलाये।
नेह जी जल्दी स्वस्थ हों - यह कामना है।

SWAPNESH RATTAN, US said...

Both poems are excellent. I think it is good that u have uploaded these poems on woman’s day.
I wish to god that Mahendra uncle will fit very soon.
Get well soon Mahender uncle.

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी सब से पहले महेन्द्रजी के शीघ्र स्वस्थ होने की मंगलकामनायें, फ़िर आप को धन्यवाद आप ने इतनी सुन्दर कविताए हम तक पहुचाई,साथ मे महेन्द्रजी का भी धन्यवाद ओर आशा करते हे भाविष्या मे भी इन की कविता पढाने कॊ मिलती रहे गी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said...

आने वाले संकलन की कवि‍ता बेजोड़ है।

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said...

महेन्‍द्र नेह के आने वाले संकलन की कवि‍ता बेजोड़ है।