Wednesday, November 21, 2007

टिप्पणियों की बॉटल चाहिए, ब्लॉगेरा या ब्लॉगर्कुलोसिस हो गया है मुझे।

मुझे अचानक जाने क्या हो गया। जब जी चाहा सारा काम छोड़ कर सीधे कम्प्यूटर पर जा बैठता और इण्टरनेट चालू कर लेता। इस बात का ख्याल नहीं रहता कि ब्रॉड बैंड की अनुमत डाउनलोडिंग करने की क्षमता का पूरा उपयोग पहले ही कर चुका हूं और अभी महीना समाप्त होने में पूरे चौदह दिन बाकी हैं। इस बात का भी ख्याल नहीं रहता कि मुझे यह सब काम अब रात को दो बजे से सुबह आठ बजे के बीच में ही करना चाहिए, जिस से फालतू रूपए न लगें। सब से पहले खोलता अपना गूगल खाता और फिर अपना ई-मेल खाता। देखता कोई मेल तो नहीं है। मेल होती तो पढ़ता और जिस का देना होता, उस का जवाब देता। फिर खोलता चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी और फिर नारद। मनचाहे चिट्ठों को पढ़ता और उन में अपनी टिप्पणियां। फिर खोलता अपना खुद का चिट्ठा, देखता इस के स्वरूप को कैसे ठीक किया जा सकता है। लिपि में आ रही गलतियों को ठीक करने का प्रयास करता। न मुझे खाने की फुरसत थी, न अपने घर के और ऑफिस के कामों की। पत्नी परेशान थी। उस के भी कई काम अटके पड़े थे, जिन को मैं नहीं कर पा रहा था। आखिर पहला चिट्ठा बन गया, प्रकाशित भी हो गया।

अब तक मुझे पता लग गया था कि मैं ब्लागेरिया, ब्लॉगेरा या ब्लॉगर्कुलोसिस जैसी किसी बीमारी का शिकार हो गया हूं। पर ब्लॉगेरिया तो एक किस्म के मच्छरों से फैलता है। इस कारण यह तो निश्चित हो गया कि यह ब्लॉगेरिया नहीं था। क्या था इस का पता लगाने के लिए किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की तलाश कर पाता, उस से पहले ही लक्षण परिवर्तित होने लगे। अब मुझे बार-बार प्यास लगने लगी, वह भी पानी पीने की नहीं अपने ब्लॉग को बार बार खोल कर पीने की। मुझे अब तक कोई चिकित्सक ऐसा नहीं मिला था जो मुझे रोग का ठीक ठीक नाम तो बता दे। जिस से मेरा इलाज शुरू हो।

यार दोस्तों को मैं कम्प्यूटर पर ही बैठा नजर आने लगा, तो उन्हों ने भी मेरे रोग का अंदाज लगाना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में वे मेरी पत्नी के साथ मिल कर किसी चिकित्सक की तलाश में जुट गए। मेरा प्रोफेशनल काम खराब होने लगा था। मैं स्वयं भी इस बीमारी से छुटकारा पाना चाहता था। पर यह बीमारी थी कि पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लें रही थी। छोड़ती भी तो कैसे, किसी को बीमारी का नाम तक पता नहीं इलाज तो दूर की बात ठहरी।

इधर चिट्ठे में पोस्टें बढ़ती जा रहीं थीं, उधर प्यास और बढ़ती जा रही थी। एक ब्लॉग और तैयार था। पहला नौसिखिया जैसे गया था। पहली पोस्ट को तीस बार ठीक करना पड़ा था।

इस बार मैं ऐसा नहीं करना चाहता था। इसे अनुभवी नहीं तो कम से कम एक शॉर्ट ट्रेनिंग प्राप्त के उत्पाद जैसा तो होना ही चाहिए था। अब प्रयास इतनी बढ़ गई कि टिप्पणियों की बॉटल चढ़ाने की नौबत आ गई। वैसे भी डा‍क्टर उन्हें मर्ज का अता-पता नहीं लगता यही करते हैं। डाला मरीज को अस्पताल के बिस्तर पर और चढ़ा दी बॉटल। मरीज का इधर-उधर भागना बंद। ज्यादा हुआ तो बॉटल में एकाध एम्प्यूल नीन्द के इंजेक्शन का और ठूंस दिया। मरीज के परिजनों को भी चैन, कि कम से कम हमें तो परेशान नहीं कर रहा। फालतू रिश्तेदार और यार- दोस्तों को भी अस्पताल आ कर मिलने का काम मिल जाता है। कइयों को घूमने-फिरने का और कइयों को बीबी की बन्दिश से निकल भागने का बहाना तक मिल जाता है।

ढूंढने और प्रयास करने पर तो भगवान भी मिल जाते हैं। अब तक जिस-जिस को मिले उन के नामों की सूची में से कोई जीवित शेष नहीं है। मुझे भी ढूंढने पर सर्च इंजन की मदद से एक डाक्टर मिल ही गया, जो कम से कम बॉटल तो चढ़ाने कों तैयार हो ही गया है। मगर यहां एक और समस्या मुंह बाए खड़ी है। मेरे शहर में ही नहीं, बड़े-बड़े शहरों तक में भी टिप्पणियों की बॉटल नहीं मिल रही है। इस चिट्ठे को पढ़ने वाले किसी भी सज्जन को कहीं टिप्पणी बॉटल के स्टॉक का पता लगे तो वह मु्झे मेरे ई-पते drdwivedi1@gmail.com पर मेल करे या फिर इस पोस्ट को पढ़ने के बाद जूते-चप्पल पहने [या खोले बिना ] इस पर कम से कम एक टिप्पणी तो पोस्ट कर ही दे। जिस से बॉटल मिलने तक तो प्यास बुझाई जा सके।

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